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औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और ऊर्जा दक्षता
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क्लोर-अल्‍कली क्षेत्र का संक्षिप्त अवलोकन

भारत में क्लोर-अल्कली इंडस्ट्री लगभग 69% बेसिक केमिकल बनाती है, जिससे यह मैन्युफैक्चरिंग में एक ज़रूरी सेक्टर बन जाता है। कॉस्टिक सोडा, क्लोरीन, हाइड्रोजन और हाइड्रोक्लोरिक एसिड क्लोर-अल्कली इंडस्ट्री के मुख्य हिस्से हैं। इन केमिकल्स का इस्तेमाल कई इंडस्ट्रीज़ में होता है, जैसे टेक्सटाइल, केमिकल पेपर, पीवीसी, वॉटर ट्रीटमेंट, एल्यूमिना, साबुन और डिटर्जेंट, ग्लास, क्लोरीनेटेड पैराफिन वैक्स वगैरह। देश में 32 प्लांट हैं, जिनमें से 56% कैपेसिटी अकेले पश्चिमी भारत में है। भारत ग्लोबल क्लोर-अल्कली कैपेसिटी का 4% हिस्सा है, जिसकी इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 4.38 मिलियन टीपीए और प्रोडक्शन 4.54 मिलियन टीपीए है।

वित्तीय वर्ष 2017-18 में अल्कली केमिकल्स का प्रोडक्शन 4.32% बढ़ा, और पिछले कुछ सालों में वृद्धि लगातार बनी हुई है। 2 मिलियन टन की कैपेसिटी के साथ गुजरात कास्टिक सोडा बनाने वाला सबसे बड़ा राज्य है। गुजरात भारत के सालाना कास्टिक सोडा प्रोडक्शन का लगभग आधा हिस्सा भी पैदा करता है, जो 2018-19 में 35.39 लाख मीट्रिक टन था। देश में क्लोर-अल्कली इंडस्ट्री के 32 प्लांट्स में से ज़्यादातर मर्चेंट यूनिट्स हैं, जिनका औसत प्लांट साइज़ लगभग 150 टन प्रति दिन (टीपीडी) है।

विनिर्माण प्रक्रिया और ऊर्जा खपत

क्लोर-अल्कली प्रोसेस को इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें कॉस्टिक सोडा और क्लोरीन एक साथ बनते हैं। इस प्रोडक्शन प्रोसेस में ब्राइन का इलेक्ट्रोलिसिस होता है, जिसके बाद नीचे दी गई तस्वीर में दिखाए गए दूसरे प्रोसेस होते हैं।

chlor-alkali

इलेक्ट्रोलाइटिक सेल इस प्रोसेस का मुख्य भाग है। इलेक्ट्रोलिसिस के लिए तीन प्रकार की सेल टेक्नोलॉजी—मरकरी, डायाफ्राम और मेम्ब्रेन—का इस्तेमाल किया जाता है। वर्तमान में क्लोर-अल्कली प्लांट्स में मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। मरकरी सेल प्रोसेस में ऊर्जा की खपत सबसे अधिक होती है, लेकिन इसमें कॉस्टिक सोडा को सांद्रित करने के लिए भाप (स्टीम) की आवश्यकता नहीं होती। मेम्ब्रेन सेल सबसे अधिक ऊर्जा दक्ष है, लेकिन लगभग 32–33% सांद्रता वाले लिकर को मानक बाज़ार उत्पाद के रूप में लगभग 50% तक सांद्रित करने के लिए कुछ भाप की आवश्यकता होती है। अधिक ऊर्जा खपत के अलावा, मरकरी सेल प्रदूषण भी फैलाते हैं, इसलिए भारत में इन्हें लगभग पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।

क्लोर-अल्कली निर्माण प्रक्रिया में बिजली ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। हालांकि, डायाफ्राम और मेम्ब्रेन सेल में बनने वाले सेल लिकर की सांद्रता बढ़ाने के लिए थोड़ी मात्रा में तापीय ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है। मेम्ब्रेन सेल प्रोसेस में इलेक्ट्रोलिसिस की ऊर्जा आवश्यकता कुल ऊर्जा का लगभग 90% होती है, जबकि शेष 10% ऊर्जा सहायक (Auxiliary) और तापीय (Thermal) ऊर्जा के बीच लगभग समान रूप से विभाजित होती है। समग्र रूप से विभिन्न उप-प्रक्रियाओं में ऊर्जा उपयोग का सामान्य वितरण नीचे दिया गया है:

उप-प्रक्रियाएँकुल ऊर्जा खपत का %
(AC kWh/T CL₂ के बराबर)
इलेक्ट्रोलिसिस89
आक्ज़िलरी5
थर्मल6

इसके अलावा, अधिकांश प्लांट्स में कोयला आधारित कैप्टिव पावर प्लांट होते हैं, जो निर्माण प्रक्रिया की लगभग पूरी बिजली की आवश्यकता को पूरा करते हैं। क्लोर-अल्कली निर्माण प्रक्रिया में प्रयुक्त ईंधनों का सामान्य मिश्रण नीचे दिया गया है:

ईंधन के प्रकार%
कोयला75
तेल2
गैस13
ग्रिड बिजली10

क्लोर-अल्‍कली क्षेत्र के लिए पीएटी योजना

क्लोर-अल्कली सेक्टर एक नामित क्षेत्र है जिसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (Bureau of Energy Efficiency - BEE) की प्रमुख निष्पादन, उपलब्धि एवं व्यापार (PAT) योजना के अंतर्गत बड़े ऊर्जा-गहन औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल किया गया है। क्लोर-अल्कली क्षेत्र के विभिन्न पीएटी चक्रों के अनुसार नामित उपभोक्ताओं (Designated Consumers - DCs) की संख्या, उनकी कुल ऊर्जा खपत (मिलियन TOE) तथा ऊर्जा बचत लक्ष्य (मिलियन TOE) नीचे दिए गए हैं:

चक्रनामित उपभोक्ताओं की संख्याकुल ऊर्जा खपत
(मिलियन TOE)
ऊर्जा बचत लक्ष्य
(मिलियन TOE)
पीएटी चक्र I220.890.09
पीएटी चक्र II241.770.102
पीएटी चक्र III---
पीएटी चक्र IV20.050.003
पीएटी चक्र V20.02820.0017
पीएटी चक्र VI---
पीएटी चक्र VII242.480.097
पीएटी चक्र VIII10.1350.00810

पीएटी चक्र-I और पीएटी चक्र-II के अंतर्गत क्लोर-अल्कली क्षेत्र द्वारा प्राप्त ऊर्जा बचत क्रमशः 0.09 मिलियन TOE तथा 0.136 मिलियन TOE रही है।

क्लोर-अल्‍कली क्षेत्र द्वारा अपनाई गई सर्वोत्तम प्रथाएँ

क्लोर-अल्कली उद्योगों ने औद्योगिक ऊर्जा दक्षता एवं डीकार्बोनाइजेशन (IEED) उपायों के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख परिचालन सर्वोत्तम प्रथाओं एवं प्रौद्योगिकियों को अपनाया है:

  1. शून्य अंतराल (Zero Gap) प्रौद्योगिकी के लिए प्रौद्योगिकी उन्नयन।
  2. माइक्रो-टरबाइन की स्थापना।
  3. फ्लेकर प्लांट को सीधे 48% गर्म कास्टिक सोडा लाइ की फीडिंग।
  4. प्रक्रिया हीटिंग/भाप की आवश्यकता के लिए फर्नेस ऑयल (FO) के स्थान पर हाइड्रोजन ईंधन का उपयोग।
  5. कैप्टिव पावर प्लांट में हाइड्रोजन का उपयोग।
  6. हाइड्रोजन का उपयोग करने वाली पीईएम (PEM) ईंधन सेल प्रौद्योगिकी।
  7. हाइड्रोजन संपीड़ित प्राकृतिक गैस (HCNG) (सीएनजी के साथ हाइड्रोजन मिश्रण)।

संबंधित मंत्रालयों का विवरण

रसायन एवं पेट्रोरसायन विभाग (https://chemicals.gov.in/)

विशेषीकृत संगठन / अनुसंधान संस्थानों का विवरण

  1. भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान (IICT), हैदराबाद 
  2. राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (NCL) 
  3. भारतीय रासायनिक अभियंता संस्थान (IIChE) 

औद्योगिक संघों का विवरण

  1. भारतीय अल्कली निर्माता संघ (AMAI) 

प्रमुख प्रौद्योगिकियों की सूची

  1. जीरो गैप इलेक्ट्रोलाइज़र
  2. ऑक्सीजन-डीपोलराइज्ड कैथोड (ODCs)
  3. कास्टिक सोडा उत्पादन में इलेक्ट्रोलिसिस हेतु हाइड्रोजन ईंधन सेल

ऊर्जा दक्षता एवं डीकार्बोनाइजेशन प्रौद्योगिकी प्रदाताओं की सूची (राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय) 

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