वस्त्र क्षेत्र का संक्षिप्त विवरण
भारतीय वस्त्र और परिधान उद्योग राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 2% तथा मूल्य के आधार पर औद्योगिक उत्पादन में लगभग 7% का योगदान देता है। वस्त्र एवं परिधान के वैश्विक व्यापार में भारत की लगभग 4% हिस्सेदारी है। वर्ष 2020-21 में वस्त्र, परिधान एवं हस्तशिल्प का संयुक्त योगदान भारत के कुल निर्यात का लगभग 11.5% था। वर्ष 2021 में घरेलू वस्त्र एवं परिधान उद्योग का आकार लगभग 130 बिलियन पाउंड था। भारतीय वस्त्र एवं परिधान उद्योग लगभग 45 मिलियन लोगों को प्रत्यक्ष तथा 100 मिलियन लोगों को संबद्ध उद्योगों में रोजगार प्रदान करता है, जिससे यह जनशक्ति के आधार पर देश का दूसरा सबसे बड़ा उद्योग है। भारत का वस्त्र उद्योग पारंपरिक हथकरघा एवं हस्तशिल्प से लेकर कपास, ऊन, रेशम तथा संगठित वस्त्र उद्योग तक विस्तृत है। संगठित वस्त्र उद्योग बड़े पैमाने पर उत्पादन हेतु पूंजी-गहन प्रौद्योगिकी का उपयोग करता है तथा इसमें परिधान निर्माण, कताई, बुनाई, प्रसंस्करण आदि शामिल हैं।
उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग के कारण वर्ष 2030 तक भारत में कपास का उत्पादन लगभग 7.2 मिलियन टन (प्रत्येक 170 किलोग्राम की लगभग 43 मिलियन गांठें) तक पहुँचने का अनुमान है। वैश्विक बाजार में हस्तशिल्प उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए उद्योग की बढ़ती भागीदारी के कारण भारत से हस्तशिल्प निर्यात में भी वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि होने की संभावना है।
विनिर्माण प्रक्रिया एवं ऊर्जा खपत
वस्त्र उद्योग में मुख्य रूप से तीन प्रकार की विनिर्माण प्रक्रियाएँ होती हैं—कताई (Spinning), बुनाई (Weaving) तथा प्रसंस्करण (Processing)। कोई इकाई इन तीनों प्रक्रियाओं को सम्मिलित रूप से संचालित कर सकती है अथवा केवल किसी एक प्रक्रिया, जैसे कताई, में कार्य कर सकती है।
- कताई प्रक्रिया: कताई प्रक्रिया में कच्चे कपास को विभिन्न चरणों के माध्यम से धागे (यार्न) में परिवर्तित किया जाता है। इसमें ब्लो रूम, कार्डिंग, ड्राइंग, रोविंग, स्पिनिंग, साइजिंग, बुनाई, डिसाइजिंग, स्कॉरिंग, ब्लीचिंग, कैलेंडरिंग, रंगाई तथा मुद्रण जैसी प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं।
- बुनाई प्रक्रिया: बुनाई धागों की सहायता से कपड़ा तैयार करने की प्रक्रिया है। इसमें ताना (Warp) एवं बाना (Weft) नामक दो प्रकार के धागों को आपस में जोड़कर कपड़ा बनाया जाता है। करघा (Loom) ताने के धागों को स्थिर रखता है जबकि बाने के धागे उनके बीच बुने जाते हैं। इस प्रक्रिया में वार्पिंग, साइजिंग, रीडिंग, वेफ्ट प्राइम वाइंडिंग, बुनाई, कतराई, फोल्डिंग तथा पैकिंग जैसी उप-प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।
- प्रसंस्करण: इसमें वस्त्र इकाई की वे सभी प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं जिनमें गीले अथवा रासायनिक उपचार किए जाते हैं। गीली प्रसंस्करण प्रक्रिया को मुख्यतः तीन चरणों—तैयारी, रंगाई तथा परिष्करण—में विभाजित किया जाता है। इसमें कपड़े अथवा धागे के प्रकार के अनुसार विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया जाता है। जिगर, विंच पैडिंग, मैंगल तथा जेट-डाइंग प्रमुख रंगाई मशीनें हैं। इसी प्रकार प्रत्यक्ष मुद्रण, ताना मुद्रण, डिस्चार्ज प्रिंटिंग, रेसिस्ट प्रिंटिंग, जेट प्रिंटिंग तथा रोटरी प्रिंटिंग जैसी विभिन्न मुद्रण तकनीकों का भी उपयोग किया जाता है।
वस्त्र मिल में ऊर्जा का उपयोग अपनाई गई विनिर्माण प्रक्रिया पर निर्भर करता है। कताई एवं बुनाई मिलों में विद्युत ऊर्जा मुख्य स्रोत होती है, जबकि प्रसंस्करण इकाइयों में विद्युत एवं तापीय दोनों प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसमें तापीय ऊर्जा का योगदान अधिक होता है। एक एकीकृत वस्त्र मिल में कुल ऊर्जा आवश्यकता का लगभग 80% भाग तापीय ऊर्जा का होता है। एक एकीकृत मिल में विद्युत एवं तापीय ऊर्जा की सामान्य खपत का विवरण नीचे दी गई तालिका में दर्शाया गया है।
| बिजली की खपत | तापीय ऊर्जा की खपत | ||
|---|---|---|---|
| क्षेत्र | % | क्षेत्र | % |
| कताई तैयारी | 13 | बॉयलर हानि | 25 |
| रिंग फ्रेम | 28 | भाप वितरण हानि | 10 |
| बुनाई | 18 | ब्लीचिंग एवं फिनिशिंग | 35 |
| आर्द्रीकरण | 19 | रंगाई एवं मुद्रण | 15 |
| प्रसंस्करण | 10 | आर्द्रीकरण एवं साइजिंग | 15 |
| अन्य | 12 | ||
कताई मिलों में ऊर्जा की खपत मुख्यतः उत्पादन मशीनरी एवं सहायक उपकरणों में प्रयुक्त विद्युत ऊर्जा के रूप में होती है। बुनाई प्रक्रिया में मशीनों के संचालन, वातानुकूलन तथा उत्पादन क्षेत्र में प्रकाश व्यवस्था हेतु ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, बुनाई लाइन को संपीड़ित वायु उपलब्ध कराने वाले कंप्रेसर भी ऊर्जा का उपभोग करते हैं। मशीनों, वातानुकूलन, प्रकाश व्यवस्था एवं कंप्रेसरों के लिए विद्युत ऊर्जा का उपयोग किया जाता है, जबकि साइजिंग तथा कुछ मामलों में वातानुकूलन जैसी प्रक्रियाओं के लिए तापीय ऊर्जा का उपयोग किया जाता है।
वस्त्र क्षेत्र के लिए पीएटी योजना
वस्त्र क्षेत्र, ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) की निष्पादन, उपलब्धि और व्यापार (PAT) योजना के अंतर्गत शामिल निर्दिष्ट क्षेत्रों में से एक है। भारत में वस्त्र उद्योग को संगठित तथा विकेन्द्रीकृत/ग्रामीण क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता है। संगठित क्षेत्र में कताई मिलें एवं कंपोजिट मिलें शामिल हैं, जबकि विकेन्द्रीकृत पावरलूम, होजरी एवं बुनाई क्षेत्र वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा भाग है।
भारतीय वस्त्र क्षेत्र में 3,000 टन तेल समतुल्य (TOE) से अधिक वार्षिक ऊर्जा खपत वाली इकाई को ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के अंतर्गत नामित उपभोक्ता (Designated Consumer - DC) के रूप में अधिसूचित किया जाता है। पीएटी चक्रवार नामित उपभोक्ताओं की संख्या, उनकी कुल ऊर्जा खपत (मिलियन टीओई) तथा ऊर्जा बचत लक्ष्य (मिलियन टीओई) नीचे प्रस्तुत किए गए हैं:
| चक्र | नामित उपभोक्ताओं की संख्या | कुल ऊर्जा खपत (मिलियन टीओई) | ऊर्जा बचत लक्ष्य (मिलियन टीओई) |
|---|---|---|---|
| पीएटी चक्र I | 90 | 1.2 | 0.13 |
| पीएटी चक्र II | 99 | 1.48 | 0.088 |
| पीएटी चक्र III | 34 | 0.668 | 0.04 |
| पीएटी चक्र IV | 7 | 0.342 | 0.0204 |
| पीएटी चक्र V | 16 | 0.2267 | 0.0135 |
| पीएटी चक्र VI | 7 | 0.112 | 0.007 |
| पीएटी चक्र VII | 120 | 1.92 | 0.099 |
| पीएटी चक्र VIII | 38 | 0.5618 | 0.0334 |
पीएटी चक्र I एवं पीएटी चक्र II के अंतर्गत वस्त्र क्षेत्र में ऊर्जा बचत उपलब्धि क्रमशः 0.13 मिलियन टीओई तथा 0.136 मिलियन टीओई रही।
वस्त्र क्षेत्र द्वारा अपनाई गई सर्वोत्तम प्रथाएँ
वस्त्र उद्योगों ने अपने औद्योगिक ऊर्जा दक्षता एवं डीकार्बोनाइजेशन (IEED) उपायों के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख परिचालन सर्वोत्तम प्रथाओं एवं प्रौद्योगिकियों को अपनाया है:
- पीवी मोटेक्स स्टेंटर से अपशिष्ट ऊष्मा पुनर्प्राप्ति (Waste Heat Recovery)।
- हीट रिकवरी यूनिट सहित निम्न-दाब (Low Pressure) एयर कंप्रेसर की स्थापना।
- फ्लैश जेट रिकवरी सिस्टम की स्थापना।
- वीविंग चिलर कूलिंग टॉवर फैन में वीएफडी (VFD) की स्थापना।
- AWT में उच्च-दाब मिस्ट स्प्रे प्रणाली की स्थापना।
- हटाने योग्य एवं पुनः उपयोग योग्य इन्सुलेशन का उपयोग।
- पल्सर डाइंग तकनीक।
- वस्त्र अपशिष्ट जल उपचार से विद्युत उत्पादन हेतु माइक्रोबियल फ्यूल सेल प्रौद्योगिकी।
- एच-प्लांट की निकास वायु से ऊर्जा पुनर्प्राप्ति के लिए विशेष टरबाइन की स्थापना, जिससे प्रकाश व्यवस्था हेतु विद्युत उत्पन्न की जाती है।
संबंधित मंत्रालयों का विवरण
विशेष संगठन / अनुसंधान संस्थानों का विवरण
- अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज़ रिसर्च एसोसिएशन (ATIRA), गुजरात
- बॉम्बे टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन (BTRA), मुंबई
- साउथ इंडिया टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन (SITRA), कोयंबटूर
- मानव निर्मित वस्त्र अनुसंधान संघ (MANTRA), गुजरात
- नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन (NITRA), गाजियाबाद
- इंडियन जूट इंडस्ट्रीज़ रिसर्च एसोसिएशन (IJIRA), कोलकाता
- वूल रिसर्च एसोसिएशन, ठाणे
औद्योगिक संघों का विवरण
मुख्य तकनीकों की सूची
- रंगाई की विभिन्न प्रक्रियाएँ जैसे पल्सर डाइंग तकनीक, एयरफ़्लो डाइंग तकनीक, डिजिटल डाइंग तथा सुपरक्रिटिकल CO2 डाइंग तकनीक।
- तकनीकी प्रक्रियाएँ जैसे अल्ट्रासोनिक असिस्टेड वेट प्रोसेसिंग तथा क्लोज्ड कंडेनसेट रिकवरी पंप।
- ह्यूमिडिफ़िकेशन एग्ज़ॉस्ट से विंड रिकवरी टरबाइन तथा टेक्सटाइल वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट से बिजली बनाने के लिए माइक्रोबियल फ्यूल सेल तकनीक।
- एच-प्लांट की निकासी हवा से एनर्जी रिकवरी के लिए एक विशेष टरबाइन की स्थापना, जो ग्रिड से जुड़ी बिजली उत्पन्न करता है और जिसका उपयोग प्रकाश व्यवस्था के लिए किया जाता है।
- क्लीन-टेक डिजिटल टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग समाधान।
- अल्ट्रासोनिक असिस्टेड वेट प्रोसेसिंग।
- सुपरक्रिटिकल CO2 डाइंग तकनीक।