लुगदी और कागज क्षेत्र का संक्षिप्त विवरण
भारतीय कागज उद्योग दुनिया के कागज उत्पादन का लगभग 3.7% हिस्सा है। यह उद्योग प्रत्यक्ष रूप से 0.5 मिलियन से अधिक लोगों तथा अप्रत्यक्ष रूप से 1.5 मिलियन लोगों को रोजगार प्रदान करता है। अधिकांश पेपर मिलें लंबे समय से संचालित हो रही हैं और इनमें सबसे पुरानी से लेकर अत्याधुनिक तकनीकों तक का उपयोग किया जाता है। भारतीय कागज उद्योग एक गैर-लाइसेंस प्राप्त क्षेत्र है तथा स्वचालित मार्ग के अंतर्गत 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति है। वित्तीय वर्ष 2019 में इस क्षेत्र में 54.93 मिलियन अमेरिकी डॉलर का एफडीआई निवेश प्राप्त हुआ। उद्योग संरचना में लगभग 27.15 मिलियन टन की स्थापित क्षमता वाली 861 से अधिक कागज इकाइयाँ शामिल हैं, जिनमें से 4.72 मिलियन टन क्षमता निष्क्रिय है। वर्तमान में लगभग 526 मिलें लगभग 87% परिचालन क्षमता के साथ कार्यरत हैं। वर्ष 2019-20 के दौरान कुल उत्पादन 20.614 मिलियन टन रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.4% की वृद्धि दर्शाता है।
कागज उद्योग को मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है, अर्थात् लेखन एवं मुद्रण (W&P), न्यूजप्रिंट तथा पेपरबोर्ड एवं औद्योगिक पैकेजिंग (पेपरबोर्ड)। पेपरबोर्ड सबसे बड़ा खंड है, जो कुल घरेलू मांग का 45% हिस्सा रखता है। इसके बाद लेखन एवं मुद्रण (35%) तथा न्यूजप्रिंट (20%) का स्थान आता है। मिलों में विभिन्न प्रकार के कच्चे माल जैसे लकड़ी, बांस, पुनर्नवीनीकरण फाइबर, खोई, गेहूं का भूसा, चावल की भूसी आदि का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में कुल उत्पादन में लकड़ी आधारित मिलों की हिस्सेदारी 20%, कृषि आधारित मिलों की 8% तथा रद्दी कागज आधारित मिलों की 72% है। वर्ष 2019-20 के दौरान कुल 2.192 मिलियन टन कागज एवं पेपरबोर्ड का आयात किया गया। भारत में प्रति व्यक्ति कागज की खपत लगभग 15.75 किलोग्राम है, जो वर्ष 2019 में विश्व औसत 57 किलोग्राम की तुलना में काफी कम है।
विनिर्माण प्रक्रिया एवं ऊर्जा खपत
लुगदी और कागज उद्योग रेशेदार कच्चे माल को लुगदी, कागज तथा पेपरबोर्ड उत्पादों में परिवर्तित करता है। लुगदी मिलें केवल लुगदी का निर्माण करती हैं, जिसे बाद में कागज एवं पेपरबोर्ड मिलों को बेचा और भेजा जाता है। कागज एवं पेपरबोर्ड मिलें लुगदी खरीद सकती हैं अथवा स्वयं अपने परिसर में उसका निर्माण कर सकती हैं। ऐसी मिलों को एकीकृत (Integrated) मिल कहा जाता है। इस उद्योग की प्रमुख प्रक्रियाओं में कच्चे माल की तैयारी, लुगदी निर्माण (रासायनिक, अर्ध-रासायनिक, यांत्रिक तथा रद्दी कागज आधारित), ब्लीचिंग, रासायनिक पुनर्प्राप्ति, लुगदी सुखाना तथा कागज निर्माण शामिल हैं।
वर्तमान में कच्चे माल की कुल आवश्यकता का लगभग 31% भाग लकड़ी एवं बांस सहित वन उत्पादों से पूरा किया जाता है। लकड़ी के लट्ठे सामान्यतः ट्रकों द्वारा मिलों तक पहुँचाए जाते हैं। चिपिंग से पहले डिबार्कर मशीनों द्वारा लट्ठों की छाल हटाई जाती है क्योंकि छाल लुगदी निर्माण प्रक्रिया में अशुद्धि का कार्य करती है। इसके बाद लकड़ी को चिपिंग मशीन (प्रायः रेडियल चिपर) में भेजा जाता है। कृषि एवं कृषि-अवशेष आधारित मिलें डंठल, भूसा तथा लकड़ी की छड़ियों जैसे कच्चे माल का उपयोग करती हैं। इन सामग्रियों को लुगदी निर्माण हेतु तैयार करने के लिए कटर एवं शियरिंग मशीनों का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में अधिकांश मिलें द्वितीयक फाइबर का भी उपयोग कर रही हैं, जिसमें रद्दी कागज सबसे प्रमुख स्रोत है।
लुगदी निर्माण का मुख्य उद्देश्य लकड़ी के रेशों को लिग्निन से अलग करना है, जो उन्हें आपस में बाँधकर रखता है, तथा इन रेशों को पानी में घोल के रूप में निलंबित कर कागज निर्माण के लिए उपयुक्त बनाना है। लकड़ी की लुगदी तैयार करने की तीन प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं—यांत्रिक लुगदी (जिसमें थर्मो-मैकेनिकल प्रक्रिया शामिल है), रासायनिक लुगदी (जिसमें क्राफ्ट एवं सल्फाइट प्रक्रिया शामिल है) तथा अर्ध-रासायनिक लुगदी।
यांत्रिक लुगदी निर्माण सबसे पुरानी प्रक्रिया है। इसमें लकड़ी एवं रद्दी कागज से रेशों को अलग करने के लिए यांत्रिक ऊर्जा और पीसने की क्रिया का उपयोग किया जाता है। इसका प्रमुख लाभ यह है कि यह रासायनिक प्रक्रिया की तुलना में अधिक उत्पादन (95% तक) देती है। हालांकि, इस प्रक्रिया में लिग्निन पूरी तरह नहीं हटता, जिसके कारण प्राप्त लुगदी की मजबूती एवं दीर्घकालिक स्थायित्व कम होता है। साथ ही पीसने की प्रक्रिया के कारण छोटे रेशे भी बनते हैं, जिससे इसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है।
थर्मो-मैकेनिकल पल्पिंग (TMP) प्रक्रिया में लकड़ी के चिप्स को पहले भाप द्वारा नरम किया जाता है और उसके बाद उन्हें RMP प्रक्रिया की तरह पीसा जाता है। यह प्रक्रिया उच्च गुणवत्ता की यांत्रिक लुगदी उत्पन्न करती है, लेकिन भाप के अधिक उपयोग के कारण इसकी ऊर्जा खपत भी अधिक होती है।
केमो-थर्मो-मैकेनिकल पल्पिंग (CTMP) में रिफाइनर पल्पिंग से पहले लकड़ी के चिप्स पर रसायनों का उपचार किया जाता है। इस प्रक्रिया की शुरुआत सोडियम सल्फाइट तथा चेलेटिंग एजेंटों के संसेचन से होती है। इसके बाद मिश्रण को 120–130°C तक गर्म किया जाता है और रिफाइनर में पीसा जाता है।
कच्ची लुगदी का रंग भूरा से क्रीम रंग तक हो सकता है क्योंकि लुगदी निर्माण के दौरान कुछ लिग्निन शेष रह जाता है। ऐसे कागज उत्पादों के लिए जिनमें अधिक चमक तथा रंग स्थिरता आवश्यक होती है, जैसे कार्यालय एवं प्रिंटिंग पेपर, कागज निर्माण से पहले ब्लीचिंग प्रक्रिया द्वारा लुगदी को सफेद किया जाता है।
कागज निर्माण प्रक्रिया को तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया जा सकता है: (1) स्टॉक तैयारी, (2) "वेट एंड" प्रक्रिया, जहाँ शीट का निर्माण होता है, तथा (3) "ड्राई एंड" प्रक्रिया, जहाँ शीट को सुखाया एवं अंतिम रूप दिया जाता है।
चित्र: एक विशिष्ट लुगदी एवं कागज संयंत्र का प्रक्रिया आरेख
(स्रोत)
लुगदी एवं कागज का उत्पादन अत्यधिक ऊर्जा-गहन प्रक्रिया है, जिसमें कुल ऊर्जा आवश्यकता का लगभग 60–80% प्रक्रिया ऊष्मा तथा 20–40% विद्युत शक्ति के रूप में उपयोग किया जाता है। तापीय एवं विद्युत ऊर्जा का अनुपात प्रयुक्त कच्चे माल तथा तैयार उत्पादों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, यदि लकड़ी के चिप्स या कृषि अवशेषों के स्थान पर रद्दी कागज का उपयोग किया जाए तो लुगदी निर्माण एवं पाचन के लिए अपेक्षाकृत कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। सामान्यतः रद्दी कागज आधारित उत्पादन प्रक्रिया में अन्य कच्चे माल की तुलना में लगभग 2.5 गुना कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
भाप एवं विद्युत शक्ति का अनुपात इस उद्योग को सह-उत्पादन (Cogeneration) तकनीक अपनाने के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाता है, जिसमें एक साथ बिजली एवं भाप का उत्पादन किया जाता है तथा प्रक्रिया की आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु टरबाइन से मध्यम एवं निम्न दाब की भाप प्राप्त की जाती है।
अधिकांश ऊर्जा का उपयोग लुगदी निर्माण प्रक्रिया (डाइजेस्टर, बाष्पीकरण तथा धुलाई) में ऊष्मा के रूप में किया जाता है, जहाँ कच्चे माल को पकाया तथा यांत्रिक या रासायनिक रूप से उपचारित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, कागज निर्माण के दौरान शीट निर्माण, दबाने तथा सुखाने के लिए भी पर्याप्त मात्रा में तापीय एवं विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
लुगदी एवं कागज निर्माण प्रक्रियाएँ कुल विनिर्माण ऊर्जा का 70% से अधिक उपयोग करती हैं, जबकि शेष लगभग 30% ऊर्जा विभिन्न उपयोगिताओं एवं सहायक प्रणालियों में खर्च होती है।
लुगदी और कागज निर्माण प्रक्रिया का विशिष्ट ईंधन मिश्रण नीचे प्रस्तुत किया गया है:
| ईंधन के प्रकार | % |
|---|---|
| कोयला | 80.00 |
| तेल | 5.00 |
| गैस | 0.00 |
| ग्रिड बिजली | 15.00 |
लुगदी और कागज क्षेत्र के लिए पीएटी योजना
भारत में 550 से अधिक लुगदी और कागज के संयंत्र हैं, जिनमें लकड़ी आधारित, कृषि आधारित और पुनर्नवीनीकरण फाइबर शामिल हैं, जो विभिन्न प्रकार के कागजों जैसे लेखन-मुद्रण, अखबारी कागज, पैकेजिंग पेपर, विशेष कागज आदि का उत्पादन करते हैं। ये कागज संयंत्र पूरे भारत में फैले हुए हैं और बड़े, छोटे और मध्यम उद्यमों में वर्गीकृत हैं। हालांकि, अधिकांश कागज संयंत्र छोटे स्तर के हैं और या तो एसएमई के अंतर्गत आते हैं या ईंधन के रूप में बायोमास का उपयोग करते हैं तथा पीएटी के अंतर्गत परिभाषित सीमा को पार नहीं करते हैं। पीएटी के अंतर्गत कवर किए गए संयंत्र क्षमता तथा उत्पादन दोनों के आधार पर इस क्षेत्र के लगभग 30% हिस्से को कवर करते हैं। पीएटी चक्रवार नामित उपभोक्ताओं की संख्या, उनकी कुल ऊर्जा खपत (मिलियन टीओई) तथा ऊर्जा बचत लक्ष्य (मिलियन टीओई) नीचे प्रस्तुत किए गए हैं:
| चक्र | नामित उपभोक्ताओं की संख्या | कुल ऊर्जा खपत (मिलियन टीओई) | ऊर्जा बचत लक्ष्य (मिलियन टीओई) |
|---|---|---|---|
| पीएटी चक्र I | 31 | 2.09 | 0.29 |
| पीएटी चक्र II | 29 | 2.68 | 0.146 |
| पीएटी चक्र III | 1 | 0.057 | 0.003 |
| पीएटी चक्र IV | 2 | 0.164 | 0.0098 |
| पीएटी चक्र V | 8 | 0.2837 | 0.0169 |
| पीएटी चक्र VI | 2 | 0.055 | 0.003 |
| पीएटी चक्र VII | 24 | 2.21 | 0.081 |
| पीएटी चक्र VIII | 7 | 0.1999 | 0.01178 |
पीएटी चक्र I और पीएटी चक्र II के अन्तर्गत लुगदी और कागज क्षेत्र में ऊर्जा बचत उपलब्धि क्रमशः 0.29 मिलियन टीओई और 0.25 मिलियन टीओई है।
लुगदी और कागज क्षेत्र द्वारा अपनाई गई सर्वोत्तम प्रथाएँ
लुगदी और कागज उद्योगों ने अपने औद्योगिक ऊर्जा दक्षता एवं डीकार्बोनाइजेशन (आईईईडी) उपायों के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख परिचालन सर्वोत्तम प्रथाओं एवं प्रौद्योगिकियों को अपनाया है:
- सुपर बैच कुकिंग।
- दो-चरण ऑक्सीजन डिलिग्निफिकेशन – ऑक्सीट्रैक।
- बीसीटीएमपी प्रक्रिया (प्रक्षालित केमो-थर्मोमैकेनिकल लुगदी)।
- सुपर बैच कुकिंग।
- अल्ट्रा-लो इंटेंसिटी रिफाइनिंग।
- ऑप्टी बैच प्रक्रिया।
- रोटरी चूना भट्ठे में बायोगैस फायरिंग (फर्नेस ऑयल का प्रतिस्थापन)।
- बॉयलर रूपांतरण: फ्लुइडाइज़्ड बबलिंग से स्पाउटेड बेड।
- कम एवं मध्यम तापमान (50°C से 250°C) पर प्रक्रिया तापन हेतु सौर ऊर्जा का उपयोग (एलपी स्टीम का प्रतिस्थापन)।
- चूना भट्ठों एवं ब्लैक लिकर बॉयलरों में ऑक्सी-फ्यूल दहन।
- लकड़ी पकाने के लिए विस्तारित डिलिग्निफिकेशन प्रणाली की स्थापना (भाप की खपत कम करने हेतु)।
संबंधित मंत्रालयों का विवरण
विशेष संगठन / अनुसंधान संस्थान का विवरण
औद्योगिक संघों का विवरण
प्रमुख प्रौद्योगिकियों की सूची
- रोटरी चूना भट्ठे में बायोगैस फायरिंग (फर्नेस ऑयल का प्रतिस्थापन)।
- बॉयलर रूपांतरण: फ्लुइडाइज़्ड बबलिंग से स्पाउटेड बेड अर्थात हाइब्रिड नोज़ल (एफबीसी एवं एएफबीसी बॉयलर)।
- लकड़ी पकाने के लिए विस्तारित डिलिग्निफिकेशन प्रणाली की स्थापना (भाप की खपत कम करने हेतु)।
- धान के भूसे से जैव ऊर्जा, सेल्यूलोसिक लुगदी, कागज एवं मूल्यवर्धित उत्पादों के उत्पादन हेतु अभिनव "बायो-रिफाइनरी" प्रौद्योगिकी।
- लिग्निन को अलग करने के लिए अवक्षेपण (Precipitation) एवं अम्लीकरण (Acidification)।
- ब्लैक लिकर का पुनर्गैसीकरण एवं ब्लैक लिकर ठोस सांद्रण।
- सतत (Continuous) डाइजेस्टर।
- न्यूमैटिक कन्वेयर के स्थान पर बेल्ट कन्वेयर का उपयोग।
- कृषि-आधारित संयंत्रों के लिए बायो-मीथेनेशन।
- चूना भट्ठों एवं ब्लैक लिकर बॉयलरों में ऑक्सी-फ्यूल दहन।
- अपशिष्ट लिकर से कॉस्टिक सोडा पुनर्प्राप्ति हेतु कॉस्टिक सांद्रण इकाई।
- ब्लीच संयंत्र के अपशिष्ट जल से ब्लीच की पुनर्प्राप्ति।
- प्रयोगशाला में विकसित नवीन तकनीक, जो बिना चूना मिलाए ग्रीन लिकर को सीधे कॉस्टिक में परिवर्तित कर सकती है।
- तापीय अनुप्रयोगों हेतु सघन सौर ऊर्जा (CSP) प्रौद्योगिकियाँ।