लौह और इस्पात क्षेत्र का संक्षिप्त अवलोकन
भारत वर्तमान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उपभोक्ता (WSA, 2020a) है। किसी भी औद्योगीकरण अर्थव्यवस्था की तरह, इस्पात क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 2% का योगदान देता है और इस्पात तथा संबंधित क्षेत्रों में लगभग 2.5 मिलियन लोगों को रोजगार देता है (MoS, 2020a)। भारतीय आयरन और स्टील क्षेत्र में हॉट रोल्ड पैरेलल फ्लैंज बीम, कॉलम रेल, प्लेट, कॉइल, वायर रॉड तथा निरंतर ढाले गए उत्पाद जैसे बिलेट्स, ब्लूम्स, बीम, ब्लैंक्स, राउंड, स्लैब, मेटालिक और फेरोअलॉय शामिल हैं। वित्त वर्ष 2018 में भारत का कच्चे इस्पात का उत्पादन पहली बार 100 मिलियन टन को पार करते हुए 106.5 मिलियन टन तक पहुँच गया, जिसमें वर्ष-दर-वर्ष 4.5% की वृद्धि दर्ज की गई। इसके साथ ही भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक बन गया। वर्ष 2020 में भारत विश्व का सबसे बड़ा स्पंज आयरन (डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन या DRI) उत्पादक भी था।
वर्ष 2017 में इस्पात मंत्रालय (MoS) ने राष्ट्रीय इस्पात नीति (NSP) प्रारंभ की, जिसमें वर्ष 2030-31 तक भारतीय इस्पात उद्योग के दीर्घकालिक विकास के लिए व्यापक रोडमैप तैयार किया गया। इस नीति का उद्देश्य वर्ष 2030 तक भारत की इस्पात उत्पादन क्षमता को 300 मिलियन टन तक बढ़ाना है। साथ ही, इसमें नवीनतम ऊर्जा दक्षता उपायों को अपनाकर प्रति टन इस्पात की ऊर्जा खपत को कम करने के लक्ष्य भी निर्धारित किए गए हैं। भारत विश्व के सबसे बड़े लौह अयस्क उत्पादकों में से एक है और वैश्विक स्तर पर चौथे स्थान पर है। लौह अयस्क इस्पात तथा प्राथमिक लोहे के निर्माण के लिए प्रमुख कच्चा माल है। देश के 85% से अधिक लौह अयस्क भंडार मध्यम अथवा उच्च श्रेणी के हैं और इनका उपयोग सीधे ब्लास्ट फर्नेस तथा डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) संयंत्रों में गांठ, सिंटर या पेलेट के रूप में किया जाता है।
विनिर्माण प्रक्रिया एवं ऊर्जा खपत
लौह एवं इस्पात के निर्माण की मूल प्रक्रिया दो चरणों में संपन्न होती है, जिसमें स्पंज आयरन और पिग आयरन के अपचयन के बाद कच्चे इस्पात का उत्पादन किया जाता है। द्वितीयक प्रक्रिया में कच्चे इस्पात से विभिन्न व्यापारिक उत्पादों का निर्माण किया जाता है। भारत का इस्पात उद्योग अन्य देशों की तुलना में अपेक्षाकृत विविधतापूर्ण है, जहाँ प्राथमिक और द्वितीयक इस्पात निर्माण क्षेत्रों में विभिन्न आकार के संयंत्र कार्यरत हैं। वर्तमान में कई तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, जिनमें ब्लास्ट फर्नेस–बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF-BOF), कोयला आधारित डायरेक्ट रिडक्शन (DR), गैस आधारित DR, इलेक्ट्रिक इंडक्शन फर्नेस (EIF) तथा इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) प्रमुख हैं। इस्पात उत्पादन में BOF तकनीक का सर्वाधिक योगदान (45%) है, जबकि EAF (28%) तथा EIF (27%) शेष उत्पादन में लगभग समान हिस्सेदारी रखते हैं।
BF-BOF प्रक्रिया का उपयोग मुख्यतः एकीकृत इस्पात संयंत्रों में किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद पिघले हुए इस्पात को निर्धारित संरचना एवं तापमान तक नियंत्रित किया जाता है और फिर निरंतर कास्टिंग मशीन द्वारा स्लैब तथा बिलेट तैयार किए जाते हैं। इन उत्पादों को रोलिंग मिल के माध्यम से आवश्यक आकार देकर विभिन्न इस्पात उत्पाद बनाए जाते हैं। स्पंज आयरन का उत्पादन DRI प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। प्रारंभ में DRI प्रक्रिया में प्राकृतिक गैस आधारित तकनीक का उपयोग होता था, लेकिन बाद में कोयला आधारित तकनीक विकसित की गई। वर्तमान में अधिकांश भारतीय स्पंज आयरन संयंत्र कोयले का उपयोग ईंधन तथा अपचायक दोनों के रूप में करते हैं। इसके बाद डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन तथा स्टील स्क्रैप को इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) में पिघलाकर पिघला हुआ इस्पात एवं अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं।

चित्र: एक विशिष्ट एकीकृत इस्पात संयंत्र का प्रक्रिया आरेख (स्रोत)
इस्पात निर्माण में उपयोग होने वाली ऊर्जा को प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों में वर्गीकृत किया जाता है। बाहर से खरीदी गई ऊर्जा जैसे कोयला, कोक, बिजली तथा गैस को प्राथमिक ऊर्जा स्रोत माना जाता है, जबकि ब्लास्ट फर्नेस गैस, कोक ओवन गैस तथा भट्टियों से प्राप्त अपशिष्ट ऊष्मा जैसी पुनर्प्राप्त ऊर्जा को द्वितीयक स्रोत माना जाता है। ऊर्जा संरक्षण के दृष्टिकोण से द्वितीयक ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को लगातार बढ़ावा दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में स्पंज आयरन संयंत्रों में अपशिष्ट ऊष्मा पुनर्प्राप्ति (WHR) आधारित विद्युत संयंत्र स्थापित किए गए हैं। लौह निर्माण सबसे अधिक ऊर्जा-गहन प्रक्रिया है, जो कुल ऊर्जा खपत का लगभग 60–70% भाग उपयोग करती है। इस उद्योग में सामान्य ईंधन मिश्रण में कोयला (83.5%), तेल (2%), गैस (1.5%) तथा ग्रिड बिजली (13%) शामिल हैं।

( स्रोत )
लौह एवं इस्पात क्षेत्र के लिए पीएटी योजना
लौह एवं इस्पात क्षेत्र, ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) की परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (PAT) योजना के अंतर्गत शामिल प्रमुख निर्दिष्ट क्षेत्रों में से एक है। इस क्षेत्र के लिए संशोधित सीमा प्रति वर्ष 20,000 मीट्रिक टन तेल समतुल्य (MTOE) ऊर्जा खपत निर्धारित की गई है। पीएटी के विभिन्न चक्रों के अनुसार नामित उपभोक्ताओं (DCs) की संख्या, उनकी कुल ऊर्जा खपत (मिलियन TOE) तथा ऊर्जा बचत लक्ष्य (मिलियन TOE) नीचे प्रस्तुत किए गए हैं।
| चक्र | नामित उपभोक्ताओं की संख्या | कुल ऊर्जा खपत (मिलियन टीओई) | ऊर्जा बचत लक्ष्य (मिलियन टीओई) |
|---|---|---|---|
| पीएटी चक्र I | 67 | 25.32 | 2.1 |
| पीएटी चक्र II | 71 | 40.44 | 2.283 |
| पीएटी चक्र III | 29 | 7.648 | 0.457 |
| पीएटी चक्र IV | 35 | 3.334 | 0.1934 |
| पीएटी चक्र V | 23 | 2.8255 | 0.1687 |
| पीएटी चक्र VI | 5 | 0.515 | 0.031 |
| पीएटी चक्र VII | 134 | 60.06 | 2.729 |
| पीएटी चक्र VIII | 66 | 3.71 | 0.2438 |
पीएटी चक्र I और पीएटी चक्र II के अंतर्गत लौह एवं इस्पात क्षेत्र में ऊर्जा बचत उपलब्धि क्रमशः 2.1 मिलियन टीओई तथा 2.921 मिलियन टीओई रही है।
लौह एवं इस्पात क्षेत्र द्वारा अपनाई गई सर्वोत्तम प्रथाएँ
लौह एवं इस्पात उद्योगों ने अपने औद्योगिक ऊर्जा दक्षता एवं डीकार्बोनाइजेशन (IEED) उपायों के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख परिचालन सर्वोत्तम प्रथाओं एवं प्रौद्योगिकियों को अपनाया है:
- ब्लास्ट फर्नेस में टॉप रिकवरी टर्बाइन तथा चूर्णित कोयला इंजेक्शन (Pulverized Coal Injection) की स्थापना।
- स्टील मेल्टिंग शॉप में एलडी गैस रिकवरी प्लांट की कमीशनिंग।
- स्टील निर्माण की पुनः तापन भट्टियों में हाइड्रोजन का उपयोग।
- ब्लास्ट फर्नेस में PCI के स्थान पर प्लास्टिक का उपयोग।
- मिनी स्टील संयंत्रों में प्रत्यक्ष रोलिंग।
- इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) में डीआरआई की हॉट चार्जिंग।
संबंधित मंत्रालयों का विवरण
विशेष संगठन / अनुसंधान संस्थानों का विवरण
- लौह एवं इस्पात अनुसंधान एवं विकास केंद्र (RDCIS), सेल, रांची
- भारतीय इस्पात अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी मिशन (SRTMI), नई दिल्ली
- इस्पात प्रौद्योगिकी उत्कृष्टता केंद्र (COEST), आईआईटी मुंबई
- राष्ट्रीय माध्यमिक इस्पात प्रौद्योगिकी संस्थान (NISST), पंजाब
औद्योगिक संघों का विवरण
प्रमुख प्रौद्योगिकियों की सूची
- 100% इलेक्ट्रोलाइटिक हाइड्रोजन आधारित डीआरआई।
- सिंटर प्लांट/डीआरआई में अपशिष्ट ताप पुनर्प्राप्ति।
- हाइड्रोजन संवर्धन।
- 80–90% कार्बन कैप्चर (CCS) के साथ हिसार्ना प्रौद्योगिकी।
- स्क्रैप पुनर्चक्रण के माध्यम से द्वितीयक क्षेत्र से उत्पादन की हिस्सेदारी बढ़ाना।
- टॉप रिकवरी टर्बाइन की स्थापना।
- ब्लास्ट फर्नेस में चूर्णित कोयला इंजेक्शन।
- कोक ड्राई क्वेंचिंग।
- पुनः तापन भट्टी के लिए पुनर्योजी/रिक्यूपरेटिव बर्नर।